Module 12

Module Twelve – Globalization

Module 12

भूमंडलीकरण

Globalization

Globalization and World Trade Organization (1)

Module 12.1

भूमंडलीकरण -1

भूमंडलीकरण और विश्व व्यापार संगठन (1)


मेरे भूमंडलीकरण के संबंध में साफ विचार हैं। अर्थशास्त्र में एक पुरानी बात बतलाई जाती है । यदि व्यापार और पूंजी निवेश के आधार पर गरीब देश का संबंध अमीर देश के साथ स्थापित हो जाता है तो कालांतर में दोनों देशों का जीवन स्तर समान हो जाता है । इसे थ्योरम आफ कंवर्जेंसकहा जाता है। यह एडम स्मिथ का विचार है। 20वीं सदी के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पाल सैमुअलसन ने  इस सिद्धांत को सिद्ध भी कर दिया था।

यह विचार सीधा सा है; जीवनस्तर उत्पादकता पर निर्भर करता है और उत्पादकता प्रौद्योगिकी पर निर्भर करती है। यह स्वत:सिद्ध है। अब हमें यह समझ लेना चाहिए कि गरीब देश अमीर देश से प्रौद्यौगिकी प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें इसका पुनर् आविष्कार नहीं करना पड़ता। इससे गरीब देशों को काफी लाभ होता है। उदाहरण के लिए आज हमारे यहां कंप्यूटर, टेलीफोन और दूरसंचार प्रणाली जैसी वस्तुएं हैं । इनका हम लोगों ने आविष्कार नहीं किया है बल्कि अमीर देशों से प्राप्त प्रौद्यौगिकी के माध्यम से विकसित किया है। इन वस्तुओं के प्रयोग से हमारा जीवन स्तर बदला है। ऊंचा उठा है। मैं समझता हूं कि यह परिवर्तन भूमंडलीकरण का प्रतीक है।

पिछले 50 वर्षों में गरीब देश एक प्रकार के बंद समाज थे। वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए नहीं थे। व्यापार बहुत सीमित था। दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में बहुत क्रांति हुई है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के दो विद्वान हुआ करते थे। एक थे जेफरी सैक्स और दूसरे थे एनड्रू वाफ। इन दोनों ने करीब 87 गरीब देशों की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया था। अध्ययन काल था 1965 से 1990। इस 25 साल की अवधि के अध्ययन  में इन दोनों अर्थशास्त्रियों का निष्कर्ष था कि 87 में से 74 देश बंद देश हैं । ये भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से जुड़े नहीं थे। इनका व्यापार सीमित था। इसके विपरित 13 देश खुले देश थे वे वैश्विक व्यापार प्रक्रिया से जुड़े हुए थे। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन खुले देशों की विकास दर बंद देशों की विकास दर से सात गुना अधिक थी। ये देश पूर्वी एशिया के थे। इसे कहते हैं  कंवर्जेस। तीसरी दुनिया के 74 देशों का कंवर्जेंस नहीं हुआ था। इसलिए वे दूसरे देशों से विकास दर में पिछड़ गए। अत: पूर्वी एशियाई देशों ( दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि) की विकास दर पाने के लिए विश्व व्यापार के साथ सहमत होना जरूरी है। संक्षेप में खुले समाज भूमंडलीकरण का हिस्सा हैं जबकि बंद समाज इससे बाहर हैं। पूर्व समाजवादी देश बंद समाज थे। वे भूंडलीकरण में शामिल नहीं थे। इसलिए उनकी अर्थव्यवस्थाएं पिछड़ती चली गईं।

1970 में विश्व आबादी का 20 प्रतिशत भाग खुले समाज का हिस्सा था और भूमंडलीकरण से जुड़ा हुआ था। आज नब्बे प्रतिशत आबादी इस प्रक्रिया से जुड़ चुकी है। चीन और भारत के इसमें शामिल होने से इसका प्रतिशत जबरदस्त ढंग से बढ़ा है। इसे सही ढंग का भूमंडलीकरण कहा जा सकता है। जबसे साम्यवाद का अंत हुआ है तबसे इस प्रक्रिया में तेजी आई है। आज बिजनेस प्रोसेस आउट-सोर्सिंग ‘ (बीपीओ) का सिलसिला चल रहा है, जिसके प्रतीक काल-सेंटर जैसे संस्थान हैं। इससे सभी को लाभ हो रहा है। इन काल-सेंटरों को भूमंडलीकरण के बच्चेकहा जा सकता है। अत: मेरी दृष्टि में थ्योरम आफ कंवर्जेंस भूमंडलीकरण का सबसे अच्छा उदाहरण है।

आज भारत की विकास दर छह प्रतिशत है । पिछले 24 वर्षों में यह स्तर बना हुआ है। इससे पहले हमारी कम वार्षिक विकास दर 1950 से 1980 के बीच बनी हुई थी। पश्चिमी देशों में जबसे औद्योगिकीकरण की शुरुआत हुई है उस समय वहां की विकास दर तीन प्रतिशत थी। करीब एक सदी तक यह प्रतिशत लगभग स्थिर रहा। अत: यदि हमारी विकास दर छह प्रतिशत की दर से जारी रहती है और जनसंख्या दर में कमी बनी रहती है तो भविष्य में  भारत की प्रति व्यक्ति आय दर में वृद्धि होगी। वर्तमान में क्रयशक्ति समानता’ (परचेसिंग पावर पैरिटी) के आधार पर वार्षिक आय 2600 यू एस डालर है जो वर्ष 2020 में 5700 डालर हो जाएगी। इसके बाद 2040 में 16600 डालर और 2066 में बढ़कर 37500 हो जाएगी। संक्षेप में वह वर्तमान में अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय दर के समान हो जाएगी। क्योंकि अमेरिका की वार्षिक विकास दर तीन है और हमारी छह। दोनों देशों की आय कंवर्जेंस होकर रहेगी। अभी मैं यह कह सकने की स्थिति में नहीं हूं कि यह कब होगी?  इसका हिसाब अभी लगाया जा रहा है। लेकिन मेरा मत है कि इसी सदी में कंवर्जेस होकर रहेगा। लेकिन चीन का कंवर्जेस हमसे बीस साल पहले होगा क्योंकि उसकी विकास दर आठ प्रतिशत वार्षिक है जो भारत से दो प्रतिशत अधिक है। भूमंडलीकरण के कारण हमारी छह प्रतिशत की यह विकास दर सात तक पहुंचने वाली है। यदि भारत में नेहरू-कालीन समाजवादी अर्थव्यवस्था नहीं होती तो असमानता और पहले दूर हो सकती थी।

एक बात और समझ लीजिए। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से संबद्ध होने के कारण ही देशों में समृद्धि आई है। कोई भी देश यह दावा नहीं कर सकता कि उसने स्वयं के बल पर ही समृद्धि अर्जित की है। अमेरिका भी जिसका अपवाद नहीं है। 19 वीं सदी में अमेरिका में ब्रिटिश पूंजी निवेश ने काफी बदलाव किया था। इसे भी निरंतर व्यापार की जरूरत रही है। अमेरिका का दक्षिणी हिस्सा उत्तरी भाग की तुलना में काफी गरीब था। लेकिन द्वितीय महायुद्ध के दौरान एयर कंडीशनिंग के आविष्कार के कारण दक्षिणी हिस्से में काफी बदलाव आया। इसी तरह योरोप में इटली और स्पेन बहुत गरीब देश हुआ करते थे। लेकिन दूसरे महायुद्ध के बाद इनकी अर्थव्यवस्थाएं भी बदलीं। 1970 तक इन देशों में काफी समृद्धि आई। कंवर्जेस प्रक्रिया शुरू हो गई। जीवन स्तर में समानता आने लगी। मैं मानता हूं कि अमेरिका और योरोप के देशों में काफी हद तक आय-समानता आ चुकी है। यह सब कंवर्जेस की बदौलत है। यही कारण है कि हांगकांग की प्रति व्यक्ति आय इंग्लैण्ड  से अधिक है। 1951 में भारत और कोरिया की प्रति व्यक्ति आय 100 डालर थी लेकिन कंवर्जेंस के कारण कोरिया की प्रति व्यक्ति आय 12 हजार डालर हो गई है और हमारी वास्तविक आय 550 डालर तक ही पहुंच सकी है क्योंकि भारत कंवर्जेस की प्रक्रिया से दूर रहा है।

(जारी)

(समयांतर द्वारा प्रकाशित और रामशरण जोशी द्वारा संपादित पुस्तक वैश्वीकरण के दौर में’  से साभार। यह लेख गुरचरण दास के साक्षात्कार पर आधारित है,पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2006)

–   गुरचरणदास

उपयोगी शब्दार्थ

( shabdkosh.com is a link for an onine H-E and E-H dictionary for additional help)

भूमंडलीकरण m

अर्थशास्त्र m

निवेश m

जीवनस्तर m

सिद्धांत  m

उत्पादकता f

प्रौद्योगिकी f

स्वत:सिद्ध

पुनर् आविष्कार m

दूरसंचार प्रणाली f

प्रतीकm

वैश्विक अर्थव्यवस्था f

विश्वयुद्ध m

अंतर्राष्ट्रीय

क्रांति f

निष्कर्ष m

प्रक्रिया f

विकास दर f

साम्यवाद m

औद्योगिकीकरण m

समृद्धि f

अपवाद m

globalization

economics

investment

standard of living

theory

productivity

technology

self-proven

re-invention

telecommunication system

symbol

global economy

world war

international

revolution

conclusion

process

rate of development

communism

industrialization

prosperity

exception

Linguistic and Cultural Notes

1. Hindi has evolved from Sanskrit and it still depends on the latter for satisfying its many linguistic needs, particularly in the area of lexical expansion to accommodate new products and concepts. However, Hindi diverges from Sanskrit slightly in three areas. The first is Sandhi. Long words like पुनर् आविष्कार would be written in Sanskrit as पुनराविष्कार (by joining the two words together) but in Hindi many would write them separately as above to make them easier to read. The second area is in the use of short and long vowels. Many Sanskrit (but certainly not all) words like धर्मच्युति+करण would be written in Sanskrit with a long as in धर्मच्युतीकरण but many Hindi writers are likely to write it as धर्मच्युतिकरण. Words like भूमण्डलीकरण will not be written with a short in Hindi as there was no short in भूमण्डल to begin with. The third area of divergence is semantic change. Many newly coined words are fixed in a certain meaning, which is not necessarily what their etymology would suggest. For example – the word उद्योग has the meaning of ‘effort’ in Sanskrit but the word is now conventionalized in the sense of ‘industry’ in Hindi.

2. The author of the above article is Gurcharan Das who is a well-known thinker in the field of economics. He was the CEO of Proctor & Gamble in India and now writes columns regularly in multiple newspapers. His well- known books are India Unbound and The Difficulty of Being Good.

Language Development

The two following vocabulary categories are designed for you to enlarge and strengthen your vocabulary.  Extensive vocabulary knowledge sharpens all three modes of communication, With the help of dictionaries, the internet and other resources to which you have access, explore the meanings and contextual uses of as many words as you can in order to understand their many connotations.

Semantically Related Words

Here are words with similar meanings but not often with the same connotation.

भूमंडलीकरण

जीवन

वैश्विक

अंतर्राष्ट्रीय

निष्कर्ष

वैश्वीकण

ज़िंदगी

सार्वभौमिक, सांसारिक               

अंतरराष्ट्रीय

परिणाम

Structurally Related Words (Derivatives)

सिद्धांत. सैद्धांतिक

उत्पाद, उत्पादन, उत्पादक, उत्पादकता, उत्पाद्य

उद्योग, उद्योगपति, औद्योगिक, औद्योगिकीकरण, प्रौद्योगिकी

आविष्कार, आविष्कृत, आविष्कारक

प्रतीक, प्रतीकात्मक

युद्ध, महायुद्ध, विश्वयुद्ध

राष्ट्र, राष्ट्रीय, राष्ट्रीयता, अंतर्राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीयता अंतरराष्ट्रीय, अन्तरराष्ष्ट्रीयता, बहुराष्ट्रीय

क्रांति, क्रांतिकारी, क्रांतिकारक

क्रिया, प्रक्रिया, प्रतिक्रिया, प्रतिक्रियात्मक, सक्रिय, सक्रियता, निष्क्रिय, निष्क्रियता

विकास, विकसित, अविकसित, विकासशील

समृद्ध, समृद्धि

Comprehension Questions

1. According to the author, globalization process has brought greater benefits to

a. rich nations

b. poor nations

c. all nations

d. some nations

2. Based on the text, what is about the growth rate?

a.  Western countries’ growth rate is increasing.

b.  India’s growth rate will catch up with the U.S.

c.  India’s growth rate will surpass China in 20 years.

d.  India and China will surpass the United States.

Globalization and World Trade Organization (2)

Module 12.2

भूमंडलीकरण – 2

भूमंडलीकरण और विश्व व्यापार संगठन (2)


मेरे मत में भूमंडलीकरण या कंवर्जेस का विरोध करना पागलपन है। सिएटल में विरोध का जो प्रदर्शन हुआ वह पागलपन था। विरोध करनेवालों में कई श्रमिक संगठनवादी थे जो अपने बाजार की रक्षा कर रहे थे। विरोध करनेवालों की कोशिश है कि भारत का उत्पादन उनके यहां तक न पहुंचे। लेकिन विश्व व्यापार संगठन का प्रयास है कि सब आगे बढ़ें। विश्व व्यापार से गरीब और अमीर दोनों को समान लाभ पहुंचे। इसलिए स्वदेशी के नाम पर संरक्षण चाहनेवालों की एक ही कोशिश है कि वे अपने समाज और देश को बंद रखना चाहते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के विशेष हित होते हैं। भारत के श्रमिक संगठनों और वामपंथियों ने भी देश को विश्व व्यापार के लिए बंद रखने के लिए दबाव बना रखा है क्योंकि वे चाहते हैं कि विदेशी उत्पाद हमारे यहां न पहुंचे। विदेशी उत्पाद और स्वदेशी उत्पाद के बीच कोई प्रतिस्पर्धा न हो । याद रखिए प्रतिस्पर्धा से उत्पाद में गुणवत्ता आती है और कीमतें घटती हैं। स्वदेशी कंपनियों को भी इससे लाभ मिलता है। उदाहरण के लिए देश में लंबे समय तक एक ही कार एंबेसडर का युग रहा। लेकिन बाजार खुलने के बाद मारुति कार आई। इसके बाद कई प्रकार की विदेशी कारें आ गईं। मारुति उद्योग को भी खुले बाजार की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार होना पड़ा। संक्षेप में प्रतिस्पर्धा एक प्रकार का स्कूलहोता है जिसमें कंपनियां गुणवत्ता में सुधार और मूल्यों को घटाने का पाठ सीखती हैं। अमेरिका भी इस प्रक्रिया से गुजरा है। वहां की मोटर कंपनियों ने प्रत्येक राष्ट्रपति से गुहार लगाई थी कि  जापानी कारों के आयात पर रोक लगाई जाए क्योंकि वहां की कार कंपनियों को जापानी कार कंपनियों के साथ कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन अब वे कंपनियां कह रही हैं  कि जापानी कारों के आने से उन्हें लाभ हुआ। उन्होंने अपनी कारों के माडल में सुधार किया है। कीमतें भी कम की हैं। यह सही है कि प्रतिस्पर्धा की प्रक्रिया बहुत पीड़ाजनक होती है। लेकिन यह पीड़ा लाभदायक होती है। इससे कंपनी और उपभोक्ता दोनों को लाभ पहुंचता है। भारत में देख लें। 1990 से यहां प्रतिस्पर्धा की लहर चल रही है। परिणामस्वरूप फ्रिज, कंप्यूटर, टीवी, कार जैसी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि नहीं हुई। इनकी गुणवत्ता में सुधार आया है। टेलीफोन क्षेत्र में भी देखा जा सकता है। आज काल-दरें घट रहीं है। टेलीफोन के नए-नए माडल दिखाई दे रहे हैं क्योंकि पिछले पांच वर्षों में प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है। यह सब प्रौद्यौगिकी के कारण संभव हुआ है।

अब सवाल उठता है कि भूमंडलीकरण का गरीबों के साथ क्या संबंध है ? मैं कहता हूं दोनों के बीच संबंध है। गरीबी एक प्रकार की बीमारी है। इस रोग का निराकरण विकास दर में वृद्धि से संभव है। इसलिए विकास-विकास-विकास होना चाहिए। कुछ लोगों का तर्क है कि विकास असमान होता है। इससे विषमता पैदा होती है लेकिन यह सही नहीं है। मैंने अपनी पुस्तक इंडिया अनबाउंड में इसके बारे में विस्तार से चर्चा की है और यह बतलाया है कि विकास से विषमता पैदा नहीं होती है। मैं यहां विश्व बैंक के एक अध्ययन का उल्लेख करना चाहूंगा। विश्व बैंक ने दो लोगों डेविड डालर और आर्ट ग्रे से करीब 90 देशों की अर्थव्यवस्था (1945 से 1990) का अध्ययन कराया था। अध्ययन में पाया गया कि गरीब देशों की दीर्घकालिक विकास की दर समान रहती है। सुरेश तेंदुलकर, मार्टिन देविलोन जैसे अर्थशास्त्रियों के अनुसार 1980 से लेकर अब तक गरीबी सीमा रेखा से नीचे रहनेवाली आबादी में से प्रति वर्ष एक प्रतिशत लोग सीमा रेखा को पार कर रहे हैं। वे ऊपर उठ रहे हैं। 1980 में देश की कुल आबादी का 46 प्रतिशत भाग गरीबी की सीमा रेखा से नीचे था। लेकिन योजना आयोग के अनुसार अब केवल 26 प्रतिशत लोग ही इस श्रेणी में आते हैं। मैं समझता हूं कि यदि यही रफ्तार जारी रहती है तो 2010 तक यह प्रतिशत घटकर 16 रह जाएगा। और दस प्रतिशत लोग सीमा रेखा से ऊपर उठ जाएंगे। इस समय गरीबी की सीमा रेखा एक डालर प्रतिदिन (46-47रु) है जिसे दो डालर करने की बात चल रही है। पर मैं यहा यह भी कहना चाहूंगा कि हमारे समाजवादी काल के दौरान शून्य प्रतिशत लोग सीमा रेखा से ऊपर उठे। समाजवाद के नाम पर केवल राजनीति की गई है। गरीबों को सबसे कम फायदा मिला। लेकिन अब भूमंडलीकरण से गरीबों को लाभ पहुंचेगा। याद रखिए, भूमंडलीकरण की वास्तविक शुरुआत राजीव गांधी के काल से हुई थी। उस समय दीर्घकालिक वित्तीय नीतिगत परिवर्तन किए गए। इंदिरा गाधी ने भी सीमेंट का डी-कंट्रोल किया था।

वैसे मैं स्वीकार करता हूं कि विश्व व्यापार प्रक्रिया में भेदभाव नहीं होना चाहिए। विश्व व्यापार संगठन को चाहिए कि वह भेदभाव और असमानता पर आधारित स्थितियों को दूर करे। उदाहरण के लिए यूरोप व अमेरिका में  किसानों को मिल रही सब्सिड़ी समाप्त होनी चाहिए । इसके बाद ही दूसरे देशों से इसकी अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि यदि अमेरिका जैसे देश गलती पर हैं तो हम लोग भी वैसा न करें। मैं देशों के दरवाजे खोलने के साथसाथ संतुलन बनाए रखने के पक्ष में हूं। कृषि व्यापार क्षेत्र की विसंगतियों को दूर किया जाना चाहिए। कपड़ा उद्योग की प्रतिस्पर्धा में शामिल होने की क्षमता भारत में है। यदि देश समाजवाद की नीति पर न चला होता तो हमारी क्षमता और भी अधिक होती। विश्व व्यापार में भारत का ऊंचा स्थान रहता। मेरा दृढ मत है कि राज्य को व्यापार और उद्योग से दूर रहना चाहिए। राज्य को चाहिए कि वह शासन-प्रशासन सुचारू रूप से चलाए। किसी का एकाधिकार न बढ़ने दे। इसे रोकने के लिए विदेशी कंपनियों और उत्पादों के लिए अपने देश के बाजार खोले । प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करे लेकिन स्वयं व्यापारउद्योग से दूर रहे। 19वीं सदी की मुक्त अर्थव्यवस्था की अवधारणा ने राज्य के हस्तक्षेप को बिल्कुल स्वीकार नहीं किया था। लेकिन अब तक के अनुभवों से यह जरूर समझ में आया है कि 21वीं सदी की मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में राज्य एक नियामक की भूमिका जरूर निभा सकता है। मिसाल के लिए सेबी और टीआरआई जैसी नियामक संस्थाएं प्रतिस्पर्धा को सुचारू रूप से संचालित करने में उपयोगी भूमिका निभा सकती हैं। 19वीं सदी के लोगों को राज्य की भूमिका की कल्पना नहीं थी।  पर आज यह जरूरी है। तब की मुक्त अर्थव्यवस्था और आज की व्यवस्था में यही सबसे बड़ा फ़र्क है। इसलिए मैं मानता हूं कि राज्य का रेगुलेटरी रोल रहना चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में भूमंडलीकरण और विश्व व्यापार संगठन को हमारे सबसे बड़े दोस्त के रूप में देखा जाना चाहिए।

(समयांतर द्वारा प्रकाशित और रामशरण जोशी द्वारा संपादित पुस्तक वैश्वीकरण के दौर में’  से साभार। यह लेख गुरचरण दास के साक्षात्कार पर आधारित है, पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 2006) सस

गुरचरणदास

उपयोगी शब्दार्थ

( shabdkosh.com is a link for an onine H-E and E-H dictionary for additional help)

प्रदर्शन m

श्रमिक संगठनवादी m/f

विश्व व्यापार संगठन m

स्वदेशी

संरक्षण m

वामपंथी              

उत्पाद m

प्रतिस्पर्धा f

गुणवत्ता f

प्रक्रिया  f

आयात m

पीड़ाजनक

लाभदायक

निराकरण m

विषमता f

दीर्घकालिक विकास m

वित्तीय

नीतिगत परिवर्तन m

औपचारिकीकरण m

संतुलन m

विसंगति f

एकाधिकार m

प्रोत्साहित करना

अवधारणा f

हस्तक्षेप m

अनुभव m

मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था f

नियामक

भूमिका  f

परिप्रेक्ष्य m

demonstration

labor unionist

World Trade Organizaton (WHO)

indigenous, produced within one’s country

protection

leftist              

product

competition

quality

process

import

painful

profitable, advantageous

removal

disparity

long term development

financial

policy-related changes

formalization

balance

anomaly

monoply

to encourage

concept

intervention

experience

free market economy

regulatory

role, background

perspective

Linguistic and Cultural Notes

1. The author Gurcharan Das writes in English and in all probability the above article is a translation. In most translated works, one misses the natural flow of the target language, but fortunately this particular ‘translation’ reads very well as it carries over the meaning and the tone of the original text while preserving the idiom and textual cohesiveness of Hindi. In the field of translation, a new word has been coined in recent times for such good translations. The word is ‘trans-creation’ which is being used more in the field of developing ads and commercials as most ads and commercials are written first in English and then trans-created in Hindi or other regional languages.

2. Socialism has been an inspirational concept for leaders of India before and after 1947 when India received her independence. The underlying idea of socialism was to help the poor. The concept of the mixed economy drove India’s economic policies until 1991 when a revolutionary change in favor of the market economy took over.

Language Development

The two following vocabulary categories are designed for you to enlarge and strengthen your vocabulary.  Extensive vocabulary knowledge sharpens all three modes of communication, With the help of dictionaries, the internet and other resources to which you have access, explore the meanings and contextual uses of as many words as you can in order to understand their many connotations.  

Semantically Related Words

Here are words with similar meanings but not often with the same connotation.

श्रमिक

स्वदेशी

संरक्षण

प्रतिस्पर्धा

पीड़ाजनक

दीर्घकालिक

परिवर्तन

संतुलन

प्रोत्साहित करना

हस्तक्षेप

अनुभव

मज़दूर

देशी

रक्षा

स्पर्धा, प्रतिद्वन्द्विता, प्रतियोगिता, मुकाबला

पीड़ादायक

दीर्घकालीन

बदल, बदलाव

तोलना

प्रोत्साहन देना

दख़लन्दाज़ी

अनुभूति

Structurally Relaetd Words (Derivatives)

दर्शन, दर्शक, दृश्य, दृश्यता, प्रदर्शन, प्रदर्शनी, प्रदर्शक, प्रदर्शनकारी, दार्शनिक

श्रम, श्रमिक, श्रमदान, परिश्रम

देश, देशी, देसी, स्वदेशी, परदेश, परदेस, परदेसी, विदेश, विदेशी

रक्षा, सुरक्षा, रक्षण, रक्षक, संरक्षण, अनुरक्षण, आरक्षण

स्पर्धा, प्रतिस्पर्धा, प्रतिस्पर्धात्मक

गुण, गुणी, गुणवान, गुणवत्ता

क्रिया, प्रक्रिया, प्रतिक्रिया, प्रतिक्रियात्मक, सक्रिय, सक्रियता, निष्क्रिय, निष्क्रियता

लाभ, लाभांश, लाभदायक,लाभप्रद, लाभकारी

समता, विषमता

नीति, नीतिगत, नैतिक

उपचार, औपचारिक, औपचारिकता, औपचारिकीकरण, अनौपचारिक, अनौपचारिकीकरण

संगति, विसंगति

उत्साह, उत्साही, उत्साहवर्धन ,उत्साहवर्धक, उत्साहजनक, प्रोत्साहन, प्रोत्साहित

अनुभव, अनुभवी, अनुभव-हीन, अनुभूति

नियम, नियमित, नियामक, अधिनियम, विनियम

Comprehension Questions

1. Based on the text, which statement is correct?

a. Some Indian organizations protested against importing foreign goods.

b. Some American organizations protested against importing foreign goods.

c. Globalization has benefitted poor people in India is a proven fact.

d. Societies that are not open to foreign goods have their own reasons.

2. Based on the text, is there a connection between globalization and poverty?

a. definitely yes

b. definitely no

c. cotroversial

d. research in progress

Neo-Liberal Mess in India

Module 12.3

भूमंडलीकरण – 3

नव-उदारवादी दलदल में भारत


गरीबीगांवों से शहरों और पिछड़े राज्यों से अपेक्षाकृत विकसित राज्यों की ओर पलायन, भ्रष्टाचार, अपराध, आतंकवाद, सामाजिक विषमता, क्षेत्रीय असंतुलन, मलिन बस्तियां आदि हमारे देश में अनेक दशकों से विद्यमान हैं मगर इनमें परिणामात्मक एंव गुणात्मक परिवर्तन 1980 के दशक के उत्तरार्ध से हो रहे हैं। लाखों दावों के बावजूद गरीबी बढ़ती ही जा रही है। सुरेश तेंदुलकर की रिपोर्ट देखें या अर्जुन सेनगुप्ता की अथवा गरीबी-रेखा के नीचे जिंदगी बसर करने वालों से जुड़ी विशेषज्ञ समिति की, सब यही रेखांकित करती हैं कि देश में आर्थिक विषमता तेजी से बढ़ रही है। गरीबी की मार से बहुत बड़ा जनसमुदाय त्रस्त है। अभी-अभी प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के अनुसार 2008-2009 में अति मंदी के कारण तीन करोड़ 40 लाख अतिरिक्त लोगों को गरीबों की जमात में धकेल दिया गया है। देश में आतंक और माओवादी आंदोलन का तेजी से विस्तार हो रहा है। अपहरण और लूटमार की वारदातें बढ़ती जा रही हैं। एक जमाना था जब संसद के परिसर से दिल्ली परिवहन निगम की बसें आती-जाती थीं और राष्ट्रपति भवन का परिसर और दुकानें आम लोगों के लिए खुली रहती थीं। आज वे वर्जित क्षेत्र के अंतर्गत हैं। अधिकतर कॉलोनियों में गेट बन गए हैं तथा चौकीदार तैनात हैं। क्षेत्रीयता जोर पकड़ रही है। महाराष्ट्र और असम की घटनाएं इसे उजागर करती हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त लोग उच्च पदों पर आसीन होते जा रहे हैं। न्यायपालिका में बैठे व्यक्तियों पर भी अंगुली उठाई जा रही है। धनाढ्य अपनी दौलत का अश्लील प्रदर्शन कर रहे हैं और सत्ता से बाहर जाने पर भी राजनेता अपने सुरक्षाकर्मियों को बनाए रखने के लिए हर संभव दबाव डालते हैं। मीडिया की कोई जनसंवेदना प्रतिबद्धता नहीं रह गई है। कम से कम लागत पर अधिकाधिक विज्ञापन-आय प्राप्त करना मुख्य उद्देश्य है। बॉलीवुड, क्रिकेट और दलाल स्ट्रीट के अतिरिक्त जोर सनसनीखेज खबरों और मुद्दों पर है।

उपर्युक्त परिवर्तन अकारण नहीं हुए हैं। वस्तुत: इनकी जड़ में देश द्वारा नव-उदारवादी आर्थिक चिंतन को अपनाकर अपने दृष्टिकोण एवं नीतियों को नेहरू युग के विपरीत ले जाया जा रहा है। जो काम पश्चिमी दबावों और धमकियों, फोरम ऑफ फ्री इंटरप्राइज, स्वतंत्र पार्टी आदि नहीं करा पाई वह बड़े ही शान्तिपूर्ण ढंग से हो गया। इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि जनता पार्टी की सरकार ने तैयार की और विश्वनाथ प्रताप सिंह और चन्द्रशेखर की सरकारों ने उसमें भारी योगदान दिया। उनके कुप्रबंधन का ही नतीजा था कि समाजवादीचन्द्रशेखर के वित्तमंत्री और अभी भाजपा के नेता भारत से सोना लेकर विदेश गिरवी रख आए। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के द्वारा नेहरु का रास्ता छोड़ नव-उदारवादी मार्ग अपनाने के लिए अमेरिकी दबाव बढ़ा। एल के झा से लेकर गुरचरणदास इसके समर्थन में अपनी किताबें लेकर आए। अंतत: नरसिंह राव की सरकार ने नव-उदारवाद को अपनाने का फैसला किया और उसके अनुकूल आर्थिक सुधार कार्यक्रम आरंभ किए जो वाजपेयी की राजग सरकार ने जारी रखे और अब भी जारी हैं। यद्यपि नव-उदारवाद शब्द पिछले तीन दशकों में अधिक प्रचलित हुआ है और दावा किया जा रहा है कि वही आगे की दुनिया का मार्गदर्शक है तथा वर्तमान युग उसी के नाम है, फिर भी उसका पहली बार इस्तेमाल जर्मन समाजविज्ञानी अलेक्जेंडर रुस्टो ने 1938 में किया। उन्होंने क्लासिकी उदारवाद को पुन: परिभाषित किया। मान्यता थी कि पूर्ण प्रतिद्वंद्विता तथा बाजार से जुड़ी तमाम जानकारियों से अवगत होने की स्थिति में उत्पादन और वितरण समुचित ढंग से होगा। विज्ञापन का उद्देश्य सही जानकारी देना मात्र होगा। कहना न होगा कि उपर्युक्त मान्यताएं कब की समाप्त हो चुकी हैं। पूर्ण प्रतिद्वंद्विता इजारेदारी के उद्भव और अर्थव्यवस्था पर हावी होने के कारण कोसों पीछे छूट गई है। उपभोक्ता हो या उत्पादक या फिर श्रमिक, किसी को पूरी जानकारी नहीं मिलती। विज्ञापन का मुख्य उद्देश्य लोगों को भ्रमित करना ही रह गया है। आप इलेक्ट्रानिक मीडिया देखें या प्रिंट मीडिया, और उदाहरण के लिए वाशिंग पाउडर को लें आपके लिए यह फैसला करना कठिन होगा कि कौनसा अच्छा है। ब्रांड, पेटेंट आदि अनेक तरीकों से सही जानकारी और मुक्त प्रतिद्वंद्विता को रोका जाता है। ब्रेटनवुड्स प्रणाली के अवसान के साथ परिवर्तनीय मुद्राओं के युग का आरंभ हुआ और भूमंडलीय पूंजी बाजार का जन्म हुआ। विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया। सोवियत संघ और समाजवादी खेमा धराशायी हो गया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन और आत्मनिर्भर स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का सपना समाप्त हो गया। सूचना और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए और पूंजीवाद का पुराना सपना कि सारे विश्व को बाजार बना संचालित किया जाये, साकार होता दिखने लगा। अमरीका एकमात्र महाशाक्ति बन गया। भूमंडलीकरण का एक नया दौर शुरू हुआ, जिसने राष्ट्र-राज्य और उसकी सार्वभौमिकता से जुडी मान्यताओं को निरर्थक कर दिया।

इस नए दौर का वैचारिक आधार नव-उदारवाद बना जिसे वाशिंगटन आम राय के रूप में जॉन विलियम्सन ने 1990 में प्रस्तुत किया। इसे अमेरीका सरकार (ट्रेजरी, फेडरल रिजर्व और वाणिज्य विभाग) और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक और इंटर अमेरिकन बैंक ने आगे बढ़ाया। जोसेफ स्टिग्लिट्ज के शब्दों में, ‘यह आम राय वाशिंगटन की 15वीं और 19 वीं सड़कों पर बनी थी। कहना न होगा कि इन्हीं सड़कों पर अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएं स्थित हैं। याद रहे कि इस आम राय के प्रेरणा स्रोत शिकागो स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स के मिलटन फ्रीडमैन, जार्ज स्टिग्लर, फ्रेडरिक फॉन हायक आदि रहे। वाशिंगटन आम राय में दस बातें हैं: (1) राजकोषीय अनुशासन : बजटीय घाटे को सीमित रखने के लिए कठोर कदम, (2) सार्वजनिक व्यय-संबंधी प्राथमिकताओं में परिवर्तन, सबसीडी में कटौती और गरीबी निवारण के कार्यक्रमों की समाप्ति (3) कर-संबंधी सुधार : कराधान के आधार का विस्तार और कर की सीमान्त दर में कमी, (4) वित्तीय उदारीकरण : ब्याज दरों का बाजार द्वारा निर्धारण, (5) विनिमय दर का ऐसा निर्धारण कि गैर परम्परागत निर्यात बढ़े, (6) व्यापार का उदारीकरण, (7) विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बेरोकटोक, (8) निजीकरण, (9) सब प्रकार के विनियमों और प्रतिबंधों को हटा नई देशी-विदेशी फर्मों के प्रवेश और काम करने पर कोई रोक नहीं हो, और (10) संपत्ति संबंधी नियम कानूनों में सुधार जिससे संपत्ति प्राप्त, इस्तेमाल और हस्तांतरण करने में कोई दिक्कत न हो। इस नव-उदारवादी चिन्तन को बढ़ाने और प्रतिष्ठित करने में थैचर, रीगन, चिली के तानाशाह पिनोशे और चीन के नेता देंग शिआयोपिंग का विशेष हाथ रहा। विश्व प्रसिद्ध मार्क्सवादी विद्वान डेविड हार्वे ने अपनी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ नियोलिबरलिज्मके मुख्य पृष्ठ पर इन चारों महानुभावों के चित्र अनायास नहीं दिए हैं। साफ है कि इस चिंतन को अपनाने में औपचारिक वैचारिक प्रतिबद्धता आड़े नहीं आई। भारत ने इसे खुले आम 1991 में अपनाया और बीस वर्षों बाद भी इसके तमाम कुपरिणामों से बिना विचलित हुए उस पर कायम है।

–  गिरीश मिश्र

उपयोगी शब्दार्थ

( shabdkosh.com is a link for an onine H-E and E-H dictionary for additional help)

अपेक्षाकृत

पलायन m

आतंकवाद m

सामाजिक विषमता f

क्षेत्रीय असंतुलन m

मलिन बस्तियां f pl.

परिणामात्मक

गुणात्मक

उत्तरार्ध m

दावा m

विशेषज्ञ समिति f

रेखांकित करना

जनसमुदाय m

त्रस्त

संयुक्त राष्ट्र m

मंदी f

अश्लील प्रदर्शन m

जनसंवेदना f

प्रतिबद्धता f

सनसनीखेज खबर m

नव-उदारवादी

दृष्टिकोण m

परिभाषित करना

इजारेदारी f

समाजवादी खेमा m

धराशायी होना

गुटनिरपेक्ष

आत्मनिर्भर

अभूतपूर्व

पूंजीवाद m

राकोषीय

प्राथमिकता f

कराधान m

सीमान्त दर f

वित्तीय उदारीकरण m

विनिमय दर f

विनियम m

प्रतिबंध m

relatively

fleeing

terrorism

social inequality

regional imbalance

dirty settlements

consequential

multiplicative

latter half

claim

specialist-committee

to underline

group of people, masses

afraid, affected

United Nations

economic depression

immoral display

people’s sensitivity

commitment

sensational news

neo-liberal

point of view

to define

monopoly

socialist camp

to be devastated

non-aligned

self-dependant

unprecedented

capitalism

=राजकोषीय related to government budget

priority

taxation

custom rate

economic liberalization

exchange rate

regulation

restriction

Linguistic and Cultural Notes

1. Sustained contact between languages and cultures triggers changes in both languages. If one group perceives the other group to be socially or politically higher then it is likely that the ‘dominated’ language will be impacted more than the ‘dominating’ language. In the case of Hindi and English, we see more influences of English on Hindi than the other way around. In the case of Hindi-Urdu contact, Hindi was impacted considerably during the period when Persian was the court language. In modern India, both Hindi and Urdu are in contact with each other at a different level and both have impacted each other. It seems that Hindi contains a greater number of Persian and Arabic loanwords than Urdu contains Sanskrit loanwords. Linguistic elements that cause changes include sounds, words, and also textual patterns to some extent.

2. India has gone through intense dialogues between various models of economic management ranging from closed-door socialism to open-door market economy. On one hand, India has benefited from the experience of other nations. While, on the other hand India has also evolved her own model where government has a more regulatory role and thousands of NGOs make a significant contribution in social transformation.

Language Development

The two following vocabulary categories are designed for you to enlarge and strengthen your vocabulary.  Extensive vocabulary knowledge sharpens all three modes of communication, With the help of dictionaries, the internet and other resources to which you have access, explore the meanings and contextual uses of as many words as you can in order to understand their many connotations.  

Semantically Related Words

Here are words with similar meanings but not often with the same connotation.

आतंकवाद

खबर

दृष्टिकोण

इजारेदारी

आत्मनिर्भर

विनियम

प्रतिबंध

दहशतगर्दी

समाचार

नज़रिया

एकाधिकार

स्वतंत्र

कानून, अधिनियम, नियम

पाबंदी


Structurally Related Words (Derivatives)

अपेक्षा, अपेक्षित, अनपेक्षित, सापेक्ष, अपेक्षाकृत

आतंक, आतंकवाद, आतंकवादी

सम, समता, विषमता

क्षेत्र, क्षेत्रीय

संतुलन, असंतुलन

परिणाम, परिणामस्वरूप, परिणामात्मक, परिणामतः

दावा, दावेदार

विशेष, विशेषता, विशेषज्ञ, विशेषज्ञता, विशिष्ट, विशिष्टता, वैशिष्ट्य

रेखा, रेखांकित

त्रास, त्रस्त

युक्त, संयुक्त

उदार, उदारता, उदारवाद, उदारवादी, औदार्य, उदारीकरण

भाषा, परिभाषा, परिभाषित

समाजवाद, समाजवादी

धरा, धराशायी

पूंजी, पूंजीपति, पूंजीवाद, पूंजीवादी, पूँजीकरण

प्रथम, प्राथमिक, प्राथमिकता

कर, कराधान

सीमा सीमान्त

Comprehension Questions

1. What is the author’s attitude in this article?

a. sarcastic

b. disapproving

c. analytical

d. emotional

2. About globalization, which one of the following is stated or implied in the article?

a. Consumerism is the direct cause of all kinds of crimes.

b. Socialist block  countries utterly opposed neo-liberalism.

c. Media ads will be critiqued for the correctness of their claims.

d. Multiple political parties of India supported globalization.

Economic Crisis from Globalization

Module 12.4

भूमंडलीकरण – 4

भूमंडलीकरण से आर्थिक संकट 

यह आर्थिक संकट बाहर से आया है लेकिन इसका हल देश के अंदर है

 

क्या भारत एक बार फिर 1991 की तरह के आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा है? क्या एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की कहानी शुरू होने से पहले ही पटाक्षेप के करीब पहुँच गई है? डालर के मुकाबले गिरते रूपये और लुढ़कते शेयर बाजार के बीच संसद से लेकर गुलाबी अखबारों और चैनलों तक में यही सवाल छाए हुए हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था की डगमगाती स्थिति को लेकर आशंकाओं और घबराहट का माहौल है। हालाँकि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी अपने कई देशी-विदेशी निवेशकों को और बाजार के साथ-साथ देश को अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन नार्थ ब्लाक से लेकर दलाल स्ट्रीट तक फैली घबराहट किसी से छुपी नहीं है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत का हाल बतानेवाले अधिकांश संकेतक लड़खड़ाते हुए दिख रहे हैं। रूपये और शेयर बाजार के साथ-साथ औद्योगिक उत्पादन वृद्धि में फिसलन, बढ़ता वित्तीय व्यापार और चालू खाते का घाटा, जी.डी.पी की गिरती वृद्धि दर और ऊपर चढ़ती महंगाई दर जैसे संकेतकों से साफ़ है कि अर्थव्यवस्था पटरी से उतर रही है।

यह भी सही है कि आंकड़ों में कई संकेतक 1991 के संकट के करीब पहुँच गए हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि स्थिति चिंताजनक है लेकिन इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि अर्थव्यवस्था 1991 की तरह के संकट में फंसने जा रही है या उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की कहानी का पटाक्षेप हो गया है।

कहने की जरूरत नहीं है कि मौजूदा आर्थिक संकट कई घरेलू और वैदेशिक कारकों का मिलाजुला नतीजा है। इन कारकों में संकट में फंसी वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितता खासकर यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के गहराते संकट का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है।

एक भूमंडलीकृत वैश्विक अर्थव्यवस्था के अभिन्न हिस्से के रूप में भारत भी इसके नकारात्मक प्रभावों से अछूता नहीं है। इस मायने में वित्तमंत्री की यह सफाई एक हद तक सही है कि रूपये और शेयर बाजार में गिरावट आदि के लिए यूनान सहित यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाओं का संकट जिम्मेदार है।

लेकिन प्रणब मुखर्जी यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं। पूरा सच यह है कि मौजूदा संकट के लिए सबसे अधिक जवाबदेही आँख मूंदकर आगे बढ़ाई गई नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों की है जिसके तहत भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी और उत्पादों के लिए न सिर्फ अधिक से अधिक खोला गया बल्कि उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ने के लिए घरेलू नीतियों को बड़ी विदेशी पूंजी खासकर आवारा पूंजी के अनुकूल बनाया गया।

स्वाभाविक तौर पर अर्थव्यवस्था के एक हिस्से खासकर घरेलू बड़ी पूंजी को इसका फायदा हुआ है तो प्रतिकूल दौर में इसके बुरे नतीजों को भी भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। यही नहीं, पिछले डेढ़-दो दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता विदेशी पूंजी खासकर आवारा पूंजी पर बढ़ती चली गई है। यह निर्भरता इस खतरनाक हद तक बढ़ गई है कि विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए सरकारें उनकी सभी जायज-नाजायज मांगें मानने के लिए मजबूर हो गई हैं।

उदाहरण के लिए, वोडाफोन टैक्स विवाद और आयकर कानून में मौजूद छिद्र को नए बजट में पीछे से संशोधन करके सुधारने या सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2 जी मामले में 122 टेलीकाम लाइसेंसों को रद्द करने और अब ट्राई द्वारा उनकी नीलामी के लिए ऊँची रिजर्व कीमत तय करने जैसे हालिया प्रकरणों को लीजिए जिन्हें देश में निवेश का माहौल बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और जिसे लेकर विदेशी निवेशक और कार्पोरेट्स इतने नाराज बताये जा रहे हैं कि वे न सिर्फ नया निवेश करने के लिए तैयार नहीं हैं बल्कि देश से पूंजी निकाल कर ले जा रहे बताये जा रहे हैं।

दरअसल, यह एक तरह का भयादोहन है कि अगर आपने बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश नहीं किया तो वे देश छोड़कर चले जाएंगे जिससे अर्थव्यवस्था संकट में फंस जाएगी। उदाहरण के लिए रूपये की गिरती कीमत और लड़खड़ाते शेयर बाजार को ही लीजिए। तथ्य यह है कि शेयर बाजार पूरी तरह से बड़े विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ.आई.आई) यानी आवारा पूंजी और कुछ बड़े घरेलू निवेशकों के चंगुल में है और वे अपनी मनमर्जी से उसे चढ़ाते-गिराते रहते हैं।

यही कारण है कि शेयर बाजार का मतलब सट्टेबाजी हो गई है। दूसरे, इस आवारा पूंजी को किसी देश की अर्थव्यवस्था से ज्यादा अपने मुनाफे की चिंता होती है। नतीजा यह कि जब तक उसे भारतीय बाजारों में मुनाफा दिखता है, आवारा पूंजी का प्रवाह बना रहता है। बाजार अकारण और अतार्किक ढंग से चढ़ता रहता है। उसके साथ आनेवाले डालर के कारण रुपये की कीमत भी चढ़ती रहती है।

लेकिन जैसे ही घरेलू या वैदेशिक माहौल बदलता या बिगड़ता है, आवारा पूंजी को सुरक्षित ठिकाने की खोज में देश छोड़ने में देर नहीं लगती है। यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि यह स्थिति भी अर्थव्यवस्था के लिए अलग तरह के संकट खड़ा कर देती है। साल-डेढ़ साल पहले तक सरकार रूपये की बढ़ती कीमत और विदेशी मुद्रा के भारी भण्डार के कारण पैदा होनेवाली समस्याओं के कारण परेशान थी।

यहाँ तक कि उसने डालर खपाने के लिए विदेशों में डालर ले जाने के नियम ढीले कर दिए। इसका उल्टा असर अब दिखाई पड़ रहा है। इस बीच, कुछ हद तक वैदेशिक और कुछ अपनी मनमाफिक नीतियों और फैसलों के न होने के कारण विदेशी पूंजी देश से निकल रही है। इससे शेयर बाजार के साथ रूपये की कीमत भी गिर रही है और अर्थव्यवस्था संकट में फंसती हुई दिख रही है।

इसके साथ ही यह भी सच है कि देशी-विदेशी निवेशक मौजूदा संकट का फायदा उठाने में लगे हैं। शेयर और मुद्रा बाजार में जमकर सट्टेबाजी हो रही है। एफ.आई.आई से लेकर बड़े निजी देशी-विदेशी बैंक/वित्तीय संस्थाएं और कार्पोरेट्स से लेकर निर्यातकों तक सभी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं और वित्त मंत्रालय से लेकर रिजर्व बैंक तक इसलिए हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं कि बाजार में हस्तक्षेप से गलत सन्देश जाएगा और बाजार को अपना काम करने देना चाहिए।

लेकिन यह जानते हुए भी कि बाजार में सट्टेबाजी चल रही है और खुलकर मैनिपुलेशन हो रहा है, सरकार का अनिर्णय हैरान करनेवाला है। सच पूछिए तो असली नीतिगत लकवायह है जहाँ सरकार जानते-समझते हुए भी सट्टेबाजों के खिलाफ कार्रवाई करने में घबराती है।

लेकिन नवउदारवादी आर्थिक सुधारों के समर्थक मौजूदा संकट के लिए यू.पी.ए सरकार के अनिर्णय और कथित नीतिगत लकवेको जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। वे सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वह न सिर्फ आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाये बल्कि आम लोगों पर बोझ बढ़ानेवाले कड़े फैसले करे।

सवाल यह है कि क्या भारत एक बनाना रिपब्लिकहै जहाँ विदेशी पूंजी और कार्पोरेट्स जो चाहे करें और सरकार चुपचाप देखती रहे? दूसरे, क्या देश को निवेश खासकर विदेशी निवेश को आकर्षित करने के नाम हर कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए? यहाँ तक कि आम लोगों खासकर गरीबों-आदिवासियों के हितों से लेकर पर्यावरण तक को कुर्बान करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए?

ये सवाल बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण हैं। इन्हें अनदेखा करके संकट से निपटने के नाम पर विदेशी पूंजी और कार्पोरेट्स को और रियायतें देने का एक ही नतीजा होगा- और बड़े संकट को निमंत्रण। सच पूछिए तो मौजूदा संकट उतना बड़ा संकट नहीं है जितना बढ़ा-चढ़ाकर गुलाबी मीडिया बता रहा है।

यह सिर्फ देश में बड़े आर्थिक संकट का डर दिखाकर और घबराहट का माहौल बनाकर अपने मनमाफिक नीतियां बनवाने और फैसले करवाने की कोशिश है। इस समय जरूरत कड़े फैसलों और किफायतशारी (आस्टैरिटी) के नाम पर लोगों पर और बोझ डालने के बजाय देश के अंदर अपने संसाधनों के बेहतर और प्रभावी इस्तेमाल के जरिये घरेलू मांग बढ़ाने और इसके लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाने की है। इस मायने में यह संकट बाहर से आया है लेकिन इसका हल बाहर नहीं, देश के अंदर खोजा जाना चाहिए।
आनंद प्रधान

anand.collumn@gmail.com

(‘दैनिक भास्करमें 18 मई, 2012 को प्रकाशित लेख)

उपयोगी शब्दार्थ

( shabdkosh.com is a link for an onine H-E and E-H dictionary for additional help)

आर्थिक संकट m

मुहाने पर खड़ा होना

पटाक्षेप m

कारकm

वित्त मंत्री m/f

निवेशक m/f

संकेतक m

अनिश्चितता f

नकारात्मक प्रभाव m

जवाबदेही f

आवारा पूंजी f

नीलामी f

भयादोहन m

संस्थागत

सट्टेबाजी f

अतार्किक

विदेशी मुद्रा f

नीतिगत लकवा m

सार्वजनिक

economic crisis

standing at the entry point

dropping of the stage curtain

factor

finance minister

investor

indicator

uncertainty

negative impact

answerability, accountability

hot money (foreign fleeting investment)

auction

engendered by fear

institutional

speculative bargaining

illogical

foreign currency

policy-related paralysis

related to people in general, general

Linguistic and Cultural Notes

1. This article is a good example of a good mix of Sanskritized, English and Urdu vocabulary. While some ‘borrowed’ words in Hindi have been fully assimilated others have not. Words like मौजूदा, ख़ासकर, फ़ायदा, अख़बार, माहौल, फ़ैसला and many others used in this article are widely understood, but there are others like किफ़ायतशारी which are not readily understood by most Hindi speakers. The same is true of the influence and impact of English in this article. Besides lending words, English also impacts new coinages in Hindi. For example, the word संकेतक has been coined to translate the English word ‘indicator’ and the word कारक has been coined to translate the English word ‘factor’.

2. This is an old article. Pranab Mukerjee, who was India’s finance minister from 2009 to 2012, has been serving as India’s president since July 2012.

Language Development

The two following vocabulary categories are designed for you to enlarge and strengthen your vocabulary.  Extensive vocabulary knowledge sharpens all three modes of communication, With the help of dictionaries, the internet and other resources to which you have access, explore the meanings and contextual uses of as many words as you can in order to understand their many connotations.  

Semantically Related Words

Here are words with similar meanings but not often with the same connotation.

प्रभाव

जवाबदेही

सार्वजनिक

असर

उत्तरदायित्व

आम

Structurally Related Words (Derivatives)

अर्थ, आर्थिक, अर्थशास्त्र

निवेश, निवेशक

संकेत, संकेतक

निश्चित, सुनिश्चित, अनिश्चित, अनिश्चितता

जवाब, जवाबदेही

नीलाम, नीलामी

सट्टा, सट्टेबाज, सट्टेबाजी

तर्क, तर्क-वितर्क, कुतर्क, तर्क-संगत, तार्किक, अतार्किक

देश, देशी, देसी, स्वदेशी, परदेश, परदेस, परदेसी, विदेश, विदेशी

Comprehension Questions

1. According to the author, which implication of FDI is not mentioned in the article?

a. Regulatory role of the Indian government is subject to exploitation.

b. Outside forces manipulate Indian stock market for their benefit.

c. India’s financial institutions are reaping benefits from the situation.

d. FDI is the direct cause of the falling value of Indian rupee.

2. According to the author, what is the root cause of India’s problems?

a. government policies

b. Foreign Direct Investment

c. Indian corporations

d. Investors’ motivation

Supplementary Material Module 12

Reading

1.नए वित्तीय वर्ष के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग- आलेख

प्रकाशित Mon, अप्रैल 04, 2011 पर 14:35  |  स्रोत : Moneycontrol.com

सीएनबीसी

 2.जोड़ी बेमिसाल

http://www.moneymantra.net.in/details

3.नव उदारवादी पूंजीवादबाज़ारवाद की व्यवस्थागत बीमारी का नतीजा है यह वैश्विक आर्थिक संकट

http://kaushalsoch.blogspot.in/2009/05/blog-post_09.html

4.महंगाई नव उदारवाद की देन है

http://www.chauthiduniya.com/2011/01/mahangai-nav-udaravad-ki-den-he.html

5.वित्तीय संकट के बाद वैश्वीकरण और विकास

अनुवाद-विजय कुमार मल्होत्रा

6.स्वास्थ्य क्षेत्र थाम सकता है आर्थिक विकास का झंडा

अरविंद सिंघल /  July 05, 2009

स्रोत : बिज़नेस स्टैंडर्ड Friday, June 04 ,2010

अनुवाद : विजय कुमार मल्होत्रा  

7. India’s Globalization: Evaluating the Economic consequenes – Baldev Raj Nayar

http://scholarspace.manoa.hawaii.edu/bitstream/handle/10125/3523/PS022.pdf?seque..

8 .बाजार ने करवट बदली, तो हिंदी में समाचार भी बदले – अरविंद दास

http://mohallalive.com/2013/05/08/a-little-part-of-news-in-hindi-1/

9. विश्व व्यापार संगठन और भारतीय अर्थ व्यवस्था

books.google.com/books?isbn=8126903678 – 

Ram Naresh Pandey – 2004

http://books.google.com/books?

Listening

1. How Devaluation of RUPEE Against Dollar leads to collapse BHAR

http://www.youtube.com/watch?v=LCYoq8lVkzA

Uploaded on Nov 21, 2011

Please watch this video and know How Devaluation of RUPEE Against Dollar Gave Loss of Rs 245 Lakh Crore in one year.

2. News X: Rupee falls past 65 to dollar to record a new low

http://www.youtube.com/watch?v=wvv9_ctY7TE&list=TLYOZXgp2GLeQ

3.Globalisation and the Indian Economy 001

https://www.youtube.com/watch?v=QhJm9XBNpVw

4.Globalisation and the Indian Economy 003

https://www.youtube.com/watch?v=uHfB5lHYJyA

5.Globalization and International Trade

https://www.youtube.com/watch?v=KtY9stUJ8L4

6.एशियाई बाज़ार 

http://hindi.moneycontrol.com/tv/cnbc-awaaz-shows/subah-laxmi_2011-07-04.html

Discussion Ideas Module 12

1. For the last couple of decades, we have been seeing an emerging middle class in the BRIC countries, which in turn has created increased demand for consumer goods. Research the performance  of BRIC countries and suggest strategies that you would like to recommend for investing in these countries?

2. In pairs, discuss which sections of the Indian economy have benefited most and been hurt most by globalization.

3. Debate whether some aspects of business education in india need to change in order to create better global business leaders.

4.  Debate in pairs on the importance of free media in a country like India. If everyone is allowed to start their own media stations and broadcast freely their thoughts, what would the situation be like?

5.  Present a 3-5 minute speech on how India’s economy was affected during the global crisis. What would have been different if India had not been such a big part of the global economy and had been shielded from outside companies and investments as in the 1980s?

6.  Debate:  Have the benefits of globalization in India outweighed the costs?

7.  Discussion:  What aspects of India’s business or culture have gained prominence around the world due to globalization?

8.  Globalization of trade has brought many advantages to big coporations and investors. Make a bullet-point summary of such advantages.

9.  Globalization has brought out massive migration of people and ideas. What are the implications of these phenomena?

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