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Module 11

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Module Eleven – Traditional Vision

परंपरागत चिंतन

Traditional Vision

Native Economics

Module 11.1

परंपरागत चिंतन1

देशी अर्थशास्त्र

 

आधुनिक अर्थशास्त्र के अनुसार सभी प्रकार के शास्त्रों का अध्ययन करके ही आर्थिक नीतियाँ बनायी जानी चाहिए। हालाँकि इस बात का कहीं उल्लेख तो नहीं मिलता पर आधुनिक अर्थशास्त्र में संभवतः आध्यात्मिक ग्रंथों का उल्लेख नहीं किया जाता। अध्यात्म उस जीवात्मा का नाम है जो इस देह को धारण करती है और जब उसकी चेतना के साथ मनुष्य काम करता है तो उसकी गतिविधियाँ बहुत पवित्र हो जाती हैं जो अंततः उसकी तथा समाज की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। आधुनिक अर्थशास्त्र उससे अपरिचित लगता है। इस देह के साथ मन, बुद्धि और अहंकार तीनों प्रकृतियाँ स्वाभाविक रूप से अपना काम करती हैं और मनुष्य को अपने अध्यात्म से अपरिचित रखती हैं।

            वैसे ही आज के सारे अर्थशास्त्री केवल बाजार, उत्पादन तथा अन्य आर्थिक समीकरणों के अलावा अन्य किसी तथ्य पर विचार व्यक्त नहीं कर पाते। कम से कम प्रचार माध्यमों में चर्चा के लिये आने वाले अनेक अर्थशास्त्रियों की बातों से तो ऐसा ही लगता है। कहीं शेयर बाजार, महंगाई या राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषय पर चर्चा होती है तो कथित रूप से अर्थशास्त्री सीमित वैचारिक आधार के साथ अपना विचार व्यक्त करते हैं जिसमें अध्यात्म तो दूर की बात अन्य विषयों से भी वह अनभिज्ञ दिखाई देते हैं। थोड़ी देर के लिये मान भी लिया जाये कि आध्यात्मिक ज्ञान का कोई आर्थिक आधार नहीं है तो भी आज के अनेक अर्थशास्त्री अन्य राजनीतिक, प्रशासनिक तथा प्रबंधकीय तत्वों को अनदेखा कर जाते हैं। यही कारण है कि महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, तथा खाद्य सामग्री की कमी के पीछे जो बाजार को प्रभावित करने वाले नीतिगत, प्राकृतिक, भौगोलिक विषयों के अलावा अन्य कारण हैं उनको नहीं दिखाई देते हैं।

            हम यहां आधुनिक अर्थशास्त्र की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित उन प्राचीन अर्थशास्त्रीय सामग्रियों को संकलित करने का आग्रह कर रहे हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र तो नाम से ही प्रामाणिक है जबकि चाणक्य नीति में भी आर्थिक विषयों के साथ जीवन मूल्यों की ऐसी व्याख्या है जिससे उसे जीवन का अर्थशास्त्र ही कहा जाना चाहिये। आधुनिक अर्थशास्त्र के अनुसार भी नैतिक शास्त्र का अध्ययन तो किया ही जाना चाहिये जिनको जीवन मूल्य शास्त्र भी कहा जाता है। आज की परिस्थतियों में यही नैतिक मूल्य अगर काम करें तो देश की अर्थव्यवस्था का स्वरूप एक ऐसा आदर्श बन सकता है जिससे अन्य राष्ट्र भी प्रेरणा ले सकते हैं।

            आधुनिक अर्थशास्त्री अपने अध्ययनों में भारतीय अर्थव्यवस्था में कुशल प्रबंध का अभावएक बहुत बड़ा दोष मानते हैं। देश के कल्याण और विकास के लिये दावा करने वाले शिखर पुरुष नित्य प्रतिदिन नये नये दावे करने के साथ ही प्रस्ताव प्रस्तुत करते हैं पर इस कुशल प्रबंध के अभाव के दोष का निराकरण करने की बात कोई नहीं करता। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही इस दोष का परिणाम है या इसके कारण प्रबंध का अभाव है – यह अलग से चर्चा का विषय है। अलबत्ता लोगों को अपने आध्यात्मिक ज्ञान से परे होने के कारण लोगों में समाज के प्रति जवाबदेही की कमी हमेशा परिलक्षित होती है।

            हम चाहें तो जिम्मेदार पद पर बैठे लोगों की कार्यपद्धति को देख सकते हैं। छोटा हो या बड़ा हो यह बहस का विषय नहीं है। इतना तय है कि भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और लापरवाही से काम करने की प्रवृत्ति सभी में है। देश में फैला आतंकवाद जितना बाहरी आश्रय से प्रत्यक्ष आसरा ले रहा है तो देश में व्याप्त कुप्रबंध भी उसका कोई छोटा सहयोगी नहीं है। हर बड़ा पदासीन केवल हुक्म का इक्का बनना चाहता है जमीन पर काम करने वालों की उनको परवाह नहीं है। उद्योग और पूंजी ढांचों के स्वामी की दृष्टि में उनके मातहत ऐसे सेवक हैं जिनको केवल हुक्म देकर काम चलाया जा सकता है। दूसरी भाषा में कहें तो अकुशल या शारीरिक श्रम को करना निम्न श्रेणी का काम मान लिया गया है। हमारी श्रीमद्भागवत गीता इस प्रवृत्ति को खारिज करती है। उसके अनुसार अकुशल या शारीरिक श्रम को कभी हेय नहीं समझना चाहिये। संभव है कुछ लोगों को श्रीगीता की यह बात अर्थशास्त्र का विषय न लगे पर नैतिक और राष्ट्रीय आधारों पर विचार करें तो केवल हुक्म देकर जिम्मेदारी पूरी करवाने तथा हुक्म लेकर उस कार्य को करने वालों के बीच जो अहं की दीवार है वह अनेक अवसरों पर साफ़ दिखाई देती है। किसी बड़े हादसे या योजनाओं की विफलता में इसकी अनुभूति की जा सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि उनका काम केवल हुक्म देना है और उसके बाद उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है मगर वह कार्य को अंजाम देने वाले लोगों की स्थिति तथा मनोदशा का विचार नहीं करते जबकि यह उनका दायित्व होता है। इसके अलावा किसी खास कार्य को संपन्न करने के लिये उसकी तैयारी तथा उसे अन्य जुड़़े मसलों से किस तरह सहायता ली जा सकती है इस पर योजना बनाने के लिये जिस बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता है वह शायद ही किसी में दिखाई देती है। सभी लोग केवल इस प्रयास में हैं कि यथास्थिति बनी रहे और इस भाव ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा अन्य क्षेत्रों में जड़ता की स्थिति पैदा कर दी है।

इसके अलावा एक बात दूसरी भी है कि केवल आर्थिक विकास ही जीवन की ऊँचाई का प्रमाण नहीं है वरन स्वास्थ्य, शिक्षा तथा वैचारिक विकास भी उसका एक हिस्सा है जिसमें आध्यात्मिक ज्ञान की बहुत जरूरत होती है। इससे परे होकर विकास करने का परिणाम हमारे सामने है। जैसे जैसे लोगों के पास धन की प्रचुरता बढ़ रही है वैसे वैसे उनका नैतिक आधार सिकुड़ता जा रहा है।

            ऐसे में लगता है कि कि हम पाश्चात्य समाज पर आधारित अर्थशास्त्र की बजाय अपने ही आध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित सामग्री का अध्ययन करें। वहां के समाजों पर आधारित पाश्चात्य अर्थशास्त्र अब हमारे ही देश के आध्यात्मिक ज्ञान पर अनुसंधान कर रहे हैं। यहां यह भी याद रखने लायक है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन केवल भगवान भक्ति तक ही सीमित नहीं है और न ही वह हमें जीवन देने वाली उस शक्ति के आगे हाथ फैलाकर मांगने की प्रेरणा देता है बल्कि उसमें इस देह के साथ स्वयं के साथ ही परिवार, समाज तथा राष्ट्र के लिये अच्छे और बड़े काम करने की प्रेरणा भी है।

दीपक भारतदीप

http://deepakraj.wordpress.com/2010/01/10/indian-economics-hindi-article/

उपयोगी शब्दार्थ

( shabdkosh.com is a link for an onine H-E and E-H dictionary for additional help)

अर्थशास्त्र m

शास्त्र m

आर्थिक

नीति f

उल्लेख m

आध्यात्मिक

चेतना f

गतिविधि f

प्रकृति f

उत्पादन m

समीकरण m

अनभिज्ञ

बेरोज़गारी f

प्रासंगिक

प्रामाणिक

नैतिक शास्त्र m

परिलक्षित होना

कार्यपद्धति f

भ्रष्टाचार m

लालफीताशाही f

आतंकवाद m

खारिज करना

अनुभूति f

यथास्थिति f

economics

field of study

economic

policy

mention

spiritual

consciousness

activity

nature

production

equation

unfamiliar, ignorant

unemployment

relevant

authentic

ethics

to be visible

working style

corruption

red-tape

terrorism

to dismiss

subtle experience

status quo

Linguistic and Cultural Notes

1. Although more than 50% India’s population claims to know Hindi as opposed to 12% who claim to know English, Hindi faces stiff competition from English. There are two major reasons for this. English undoubtedly has a strong position in professional domains as a language of wider communication globally and locally. Secondly, Hindi faces opposition from some other Indian languages within India. In terms of internal competition, English is a language of equal advantage to speakers of all Indian languages and thus does not allow an advantageous position to Hindi speakers for jobs. Undoubtedly Hindi is growing as a link language in India in informal domains of language use, but English continues to be the preferred language, at least in big cities in formal/prestigious domains of language use. However, Hindi is gradually forging its way ahead especially in entertainment and the media.

2. While Western thought in a discipline like economics is considered important and useful for national development in India, a strong urge for combining it with traditional wisdom is emerging in many circles. Many scholars believe that digging into indigenous thought processes will trigger more creativity in local thinking and also nurture national pride.

Language Development

The two following vocabulary categories are designed for you to enlarge and strengthen your vocabulary.  Extensive vocabulary knowledge sharpens all three modes of communication, With the help of dictionaries, the internet and other resources to which you have access, explore the meanings and contextual uses of as many words as you can in order to understand their many connotations.

Semantically Related Words

Here are words with similar meanings but not often with the same connotation.

आर्थिक

प्रकृति

उत्पादन

बेरोज़गारी

कार्यपद्धति

आतंकवाद

खारिज करना

अनुभूति

माली

कुदरत

पैदावार

बेकारी

कार्यप्रणाली

दहशतगर्दी

ख़त्म करना, समाप्त करना

अनुभव

 

Structurally Related Words (Derivatives)

अर्थ, आर्थिक, अर्थशास्त्र

नीति, नीतिगत, नैतिक

लिख, लेख, उल्लेख, उल्लेखनीय, अभिलेख

अध्यात्म, आध्यात्मिक

चेतन, चेतना, चित्, चित्त

प्रकृति, प्राकृतिक

उत्पाद, उत्पादन, उत्पादक, उत्पादकता

सम, समीकरण

अभिज्ञ, अनभिज्ञ, अनभिज्ञता

रोज़गार, बेरोज़गार, बेरोज़गारी

प्रसंग, प्रासंगिक

प्रमाण, प्रामाणिक

भ्रष्ट, भ्रष्टाचार

आतंक, आतंकवाद, आतंकवादी

अनुभव, अनुभवी, अनुभवहीन, अनुभूत, अनुभूति

Comprehension Questions

1. Which of the following is not stated to be part of spirituality?

a. dignity of labor

b. ethics

c. social issues

d. religious rituals

2. Which of the following does not conform to the text?

a. integration of Indian thoughts in modern economics

b. devotion to God as the basis of economic activity

c. nationalistic thinking as the basis of economic activity

d. study of Indian scriptures as basis of Indian economics